अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ

अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याओं के समाधान के लिए 2006 में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बनाया गया। यह प्रकोष्ठ प्राथमिकता प्राप्त शिक्षार्थी समूहों के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 और कार्रवाई योजना (पीओए), 1992 के क्रियान्वयन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मकतबों और मदरसों को प्रत्यायन प्रदान करके वैकल्पिक विद्यालयी शिक्षा द्वारा मुस्लिम बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास कर रहा है। इस प्रकार अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ सच्चर समिति और प्रधानमंत्री के 15 बिंदु कार्यक्रम की संस्तुतियों के प्रकाश में विद्यालय स्तर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा के अवसर बढ़ाने के लिए भारत सरकार के नीतिगत प्रयासों का एक प्रमुख उपकरण बन गया है।

अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ अल्पसंख्यक संस्थाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए नियमों में काफी छूट देकर प्रत्यायन प्रदान करता है। इससे मुस्लिमों की पारंपरिक शैक्षिक संस्थाओं जैसे मदरसों, मकतबों और दारूल-उलूमों को शिक्षा की प्रमुख धारा से जोड़ने में सहायता मिलती है। अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ अल्पसंख्यक संस्थाओं के प्रत्यायन एवं शिक्षा के लिए समर्थन कार्यक्रम आयोजित करता है।

मदरसों - गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने के लिए केन्द्रीय प्रवर्तित योजना (एसपीक्यूईएम)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) ने राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की संकल्पना अपनाई है जिसका अर्थ है कि एक स्तर विशेष तक सभी विद्यार्थी चाहे वे किसी जाति धर्म, भाषा अथवा लिंग के हों, उन्हें समान गुणवत्ता की शिक्षा दी जाएगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए अल्प संख्यकों के उत्थान के लिए हर संभव साधन प्रदान करने का संकल्प लिया है। उन्हें आधुनिक विषयों में शिक्षा प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार क्षेत्र गहन और मदरसा आधुनिकीकरण योजना लागू कर रही है। अल्पसंख्यकों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय मानीटरिंग समिति (एनएमसीएमई) का गठन 2004 ईएसए अल्पसंख्यकों की शिक्षा के सभी पहलुओं की देखभाल के लिए किया गया। विशेषज्ञ समिति ने सुझाव दिया कि मदरसों को शैक्षिक स्तरों के प्रमाणपत्र, व्यावसायिक शिक्षा के साथ संपर्क और आधुनिक विषयों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) के साथ संबद्ध किया जाए।

इस योजना का उद्देश्य प्रारंपरिक संस्थानों जैसे मदरसों और मकतबों को विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन, हिंदी और अंग्रेजी विषयों की पाठ्यचर्या आरंभ करने के लिए प्रोत्साहित करना है (वित्तीय सहायता प्रदान करके)। यद्यपि पारंपरिक मदरसों और मकतबों के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया स्वैच्छिक होगी। मसतब/मदरसे/दार-उल-उलूम उच्चतर माध्यमिक स्तर के कार्यक्रम चलाने के लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान के प्रत्यायित अध्ययन केन्द्र बनने का विकल्प चुन सकते हैं। यह योजना मदरसों में पढ़ रहे बच्चों के व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए अवसर प्रदान करने का भी प्रयास करेगी जिससे वे रोजगार बाजार में प्रवेश कर सकेंगे और उद्यमशीलता को बढ़ाया जा सकेगा। एसपीक्यूईएम एक मांग आधारित योजना है। यह योजना ग्यारहवीं योजना अवधि के दौरान देशभर में कुल 4,500-6,000 मदरसों को शामिल करने का प्रयास करेगी और मदरसों में लगभग 13,500-18,000 शिक्षकों को मानदेय प्रदान करेगी।

विज्ञान, गणित, सामाजिक अध्ययन भाषाएँ और कम्प्यूटर एप्लिकेशन को पढ़ाने के लिए शिक्षकों को नियुक्ति हेतु प्रत्येक पूर्णकालिक स्नातक शिक्षक को 12 माह के लिए 6,000/- रुपये प्रतिमाह की दर पर वेतन प्रदान किया जाएगा। प्राथमिक/ मिडल/माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर पुस्तकालयों/पुस्तक बैंकों को और बेहतर बनाने के लिए प्रत्येक मदरसा को 50,000/- रुपये की एक मुश्त सहायता और बाद में 5,000/- रुपये का वार्षिक अनुदान दिया जाएगा। माध्यमिक/उच्चतर माध्यमिक स्तरों पर मदरसों ने विज्ञान/कम्प्यूटर प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए 10,000/- रुपये की अधिकतम वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। एनआईओएस के माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तरों द्वारा अध्ययन का विकल्प लेने वाले प्रत्येक विद्यार्थी के लिए पंजीकरण शुल्क, परीक्षा शुल्क और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) द्वारा दी गई अध्ययन सामग्री के मूल्य हेतु 10/- रु. तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। मदरसे एनआईओएस द्वारा निर्धारित नियमों और मानदण्डों की पूर्ति करते हुए एनआईओएस द्वारा चलाए जा रहे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का चुनाव भी कर सकते हैं।

ऐसे मदरसे जो कम से कम तीन वर्षों से कार्य कर रहे हैं और केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार अधिनियमों अथवा मदरसा बोर्ड अथवा वक्फ बोर्डों अथवा एनआईओएस के अंतर्गत पंजीकृत हैं वे इस कार्यक्रम के अंतर्गत सहायता के लिए आवेदन करने हेतु योग्य हैं। ऐसे सभी मदरसे जो दूरस्थ शिक्षा विधा द्वारा शामिल होना चाहते हैं और सरकारी अनुदान का लाभ लेना चाहते हैं उन्हें एनआईओएस द्वारा प्रत्यायित होने की आवश्यकता है। योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता के लिए आवेदन करने वाले मदरसों को राज्य सरकार को राज्य मदरसा बोर्डों/ एनआईओएस के अंतर्गत अपनी मान्यता/प्रत्यायन का दस्तावेज़ी प्रमाण देना होगा। इस उद्देश्य के लिए मदरसों को एनआईओएस में प्रत्यायन/मान्यता के लिए एक आवेदन भेजना होगा। ग्यारहवीं योजना के दौरान केन्द्र सरकार इस योजना के लिए 100/- रु. अनुदान प्रदान करेगी। योजना के अंतर्गत वार्षिक आधार पर वित्तीय सहायता उन राज्य/ सरकारों/केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रशासन द्वारा दी जाएगी जिनके क्षेत्राधिकार में संस्थान स्थित हैं।

यह योजना राज्य सरकारों द्वारा लागू की जाएगी एक नियम के रूप में वित्तीय सहायता के लिए सभी अनुरोध निर्धारित आवेदन फार्म में राज्य सरकार द्वारा निष्पादित किए जायेंगे।

बिहार में मुस्लिम लड़कियों के लिए हुनर परियोजना

2008-09 से एनआईओएस ने बिहार शिक्षा परियोजना परिषद् (बीईपीसी) के सहयोग से बिहार में मुस्लिम लड़कियों को सात व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए हुनर परियोजना आरंभ की है। ग्राम सखी, कटाई, सिलाई एवं पोशाक निर्माण, बेसिक ग्रामीण प्रौद्योगिकी, जूट उत्पादन, बेकरी एवं कनफेक्शनरी, सौंदर्य संवर्द्धन और प्रारंभिक शिशु देखभाल एवं शिक्षा जैसे पाठ्यक्रमों में कुल 13768 मुस्लिम लड़कियों को कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

हुनर परियोजना चरण-II

इस परियोजना की सफलता को देखते हुए बिहार सरकार ने एनआईओएस को चरण-II के लिए जारी रखने के लिए कहा और सत्र 2010-11 के लिए मुस्लिम, अनु.ज., अनु.ज.ज. और अधिकांश पिछड़े समुदायों की 50,000 से अधिक लड़कियों को शिक्षित करने का लक्ष्य दिया। लगभग 45,298 शिक्षार्थियों ने नामांकन कराया और 23 और 24 जुलाई, 2011 को आयोजित परीक्षा में 12,252 शिक्षार्थी बैठे, हुनर चरण-I के अंतर्गत शामिल 298 प्रत्यायित संस्थाओं के अतिरिक्त इस कार्यक्रम को चलाने के लिए 723 नए ओबीएच अध्ययन केन्द्रों को प्रत्यायित किया गया। ये 723 ओबीएच अध्ययन केन्द्र बीईपीसी द्वारा संस्तुति प्राप्त माडल, स्कूल, संस्थाएँ और एनजीओ हैं।

हुनर परियोजना दिल्ली

एनआईओएस ने दिल्ली में हुनर परियोजना आरंभ की। 26 फरवरी, 2011 को दिल्ली में आयोजित एक समारोह में इस कार्यक्रम का उद्घाटन माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल और दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित के साथ-साथ अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने किया। लड़कियों को निःशुल्क नामांकन कराने और कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए इस कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 16 संस्थाएँ प्रत्यायित की गईं। इन संस्थाओं में लगभग 1678 लड़कियाँ नामांकन किया गया हैं।

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